“प्रेमाश्रम” भारत के ग्रामीण जीवन, जमींदारी शोषण और सामाजिक असमानता पर आधारित उपन्यास है। कथा लखनपुर गाँव के किसानों के दुःख, कर-उगाही, रिश्वत और जमींदार-कारिंदों के अत्याचारों से शुरू होती है। मनोहर, सुक्खू, दुखरन जैसे किसान अपनी विवशताओं, गरीबी और फूट से ग्रसित समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। दूसरी ओर काशी में जमींदार परिवार जटाशंकर-प्रभाशंकर की आर्थिक दुर्दशा, कुल-मर्यादा, अतिथि-सत्कार और फिजूलखर्ची के कारण टूटते घराने को दिखाता है। नवशिक्षित ज्ञानशंकर परिवर्तन और मितव्ययिता चाहता है, जबकि उसका चाचा परम्परा, उदारता और मान-सम्मान को सर्वोपरि मानता है। प्रेमशंकर का घर छोड़कर विदेश चले जाना और ग्रामीणों का उत्पीड़न उपन्यास में परिवारिक विघटन और सामाजिक अन्याय को रेखांकित करते हैं। किसान-जमींदार संबंध, अंग्रेजी शासन, सामाजिक शोषण, शिक्षा बनाम परम्परा और वर्ग संघर्ष के माध्यम से प्रेमचंद ने तत्कालीन भारतीय समाज का यथार्थ और जागृति की आवश्यकता को अत्यंत प्रभावपूर्ण ढंग से उभारा है।