गुंडा जयशंकर प्रसाद की एक मार्मिक और प्रभावशाली कहानी है जो मानवीय संबंधों, सामाजिक संघर्षों और व्यक्तिगत नैतिकता की जटिलताओं को उजागर करती है। यह कहानी बनारस के एक ऐसे व्यक्ति की है जिसे लोग 'गुंडा' कहते हैं, लेकिन उसका जीवन और उसकी परिस्थितियाँ उसे एक अलग दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती हैं। प्रसाद जी ने अपनी विशिष्ट शैली में इस चरित्र के आंतरिक द्वंद्वों और उसके जीवन के सफर को बड़ी गहराई से चित्रित किया है।
यह कहानी समाज के हाशिए पर पड़े लोगों की आवाज़ उठाती है और दिखाती है कि कैसे बाहरी धारणाएँ अक्सर किसी व्यक्ति के सच्चे स्वरूप से अलग होती हैं। 'गुंडा' केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक पहचान है जो परिस्थितियों और मानवीय स्वभाव के बीच के संघर्ष को दर्शाती है। यह पाठकों को सोचने पर मजबूर करती है कि क्या वास्तव में कोई व्यक्ति केवल अपने बाहरी रूप से जाना जाता है, या उसके भीतर की अच्छाई और बुराई का मिश्रण उसे परिभाषित करता है।