‘कंकाल’ शुद्ध यथार्थवादी कृति है जिसमें बिना किसी महत्ता या आदर्श आरोपण के समाज की विषमता को तटस्थ भाव से चित्रित किया गया है। यह एक सामाजिक व्यंग्य है जो समाज में व्याप्त विकृतियों, कमजोरियों को उघाड़-उघाड़कर उन पर अटट्टास करता है। ‘तितली’ ग्राम्य जीवन पर आधारित आदर्शवादी उपन्यास है। इस उपन्यास के माध्यम से प्रसाद ने नारी समस्या के विभिन्न पक्षों को उजागर किया है। उन्होंने विधवा विवाह, अनमेल विवाह, दहेज-प्रथा आदि कुप्रथाओं को स्थूल रूप न देकर व्यापक धरातल पर रखकर जाँचने-परखने का काम किया है। “इरावती’ (अपूर्ण) ऐतिहासिक उपन्यास धारा का सूत्रपात करता है। इसकी मूल समस्या सांस्कृतिक है। लेखक ने अशोक की मृत्यु के पश्चात् भी आर्य-साम्राज्य की डगमगाती स्थिति तथा बौद्ध धर्म के जर्जर स्वरूप को इस उपन्यास में उत्कीर्ण करने का प्रयत्न किया है।