Prayas

· Storyside IN · Sanchit Vartak ଦ୍ଵାରା ବର୍ଣ୍ଣନା କରାଯାଇଛି
ଅଡିଓବୁକ୍
8 ଘ. 2 ମି.
ଅସଂକ୍ଷିପ୍ତ ଅଟେ
ଯୋଗ୍ୟ
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ଏହି ଅଡିଓବୁକ୍ ବିଷୟରେ

मधला छोटासा काही क्षणांचा कालखंड जणू तो जगलाच नव्हता. साक्षात मृत्यूचा अनुभव त्याला त्या काळात येत होता. गळ्याच्या वर गालाच्या हाडाला शेरखाननं रिव्हॉल्व्हरची नळी टेकवली, आणि त्याचा तो मृत्यु-प्रवास सुरू झाला. जिवंतपणाची सारी लक्षणं त्याच्या मनानं, मेंदूनं, नि शरीरानं त्यजून टाकली. पुढच्या साऱ्या हालचाली झाल्या त्या कलेवरावर ताबा मिळवून कोणा मांत्रिकानं स्वतःच्या इच्छेनुसार कलेवराला हालचाली करायला लावाव्यात, तशा ! त्यात तो, त्याच्या इच्छा कुठेच नव्हत्या. अन् आता, सगळं संपल्यावर त्याचे प्राण त्याला परत मिळाले होते. खंडित कालखंड वगळून आयुष्य पुन्हा सांधलं गेलं होतं. पहिली जिवंत प्रतिक्रिया स्वतःच्या अगतिकपणाबद्दल, भित्रेपणाबद्दल स्वतःचा राग. थू! त्या लुकड्या शेरखाननं निर्जीव लोखंडी नळीचं टोक आपल्या शरीराला भिडवलं आणि आपण त्याला शरण गेलो ? शरम वाटायला हवी सुशांत ठाकूर तुला. सुहास शिरवळकरांच्या लेखणीतून जिवंत झालेली अजून एक उत्कंठावर्धक कादंबरी.
मधला छोटासा काही क्षणांचा कालखंड जणू तो जगलाच नव्हता. साक्षात मृत्यूचा अनुभव त्याला त्या काळात येत होता. गळ्याच्या वर गालाच्या हाडाला शेरखाननं रिव्हॉल्व्हरची नळी टेकवली, आणि त्याचा तो मृत्यु-प्रवास सुरू झाला. जिवंतपणाची सारी लक्षणं त्याच्या मनानं, मेंदूनं, नि शरीरानं त्यजून टाकली. पुढच्या साऱ्या ...

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